लैंगिक जनन, उसकी अवस्थाएं तथा लाभ ( Sexual Reproduction, It’s Stages and Advantages)

24/01/2021 Vinod 0 Comments

लैंगिक जनन (Sexual Reproduction) :-

जनन की वह विधि जिसमें किसी जाति के दो जीव भाग लेते हैं जिसमें एक मादा तथा दूसरा नर होते हैं, इनके द्वारा नए संतति उत्पन्न होते हैं जो आनुवंशिक रूप से अपने जनकों से भिन्न होते हैं, वे लैंगिक जनन कहलाते हैं।

लैंगिक जनन लगभग सभी जीवधारियों में होते हैं, परंतु उच्च श्रेणी के पौधों तथा जंतुओं में यह जनन की एकमात्र प्राकृतिक विधि है। लैंगिक जनन में विपरीत लिंग वाले जीवो द्वारा नर तथा मादा युग्मक बनाए जाते हैं। नर तथा मादा युग्मकों के संगलन से युग्मनज बनता है, यह विकसित होकर नए जीव को जन्म देता है।

  • सभी जीवों को लैंगिक जनन से पूर्व वृद्धि की एक निश्चित अवस्था तक आना पड़ता है, जब ये जीव परिपक्व हो जाते है तब वह लैंगिक जनन करने के लिए समर्थ हो पाते है।

लैंगिक जनन की अवस्थाएं (Stages of Sexual Reproduction) :-

जीवो में लैंगिक जनन की मुख्यत: तीन अवस्थाएं होती है –

  1. निषेचन – पूर्व अवस्थाएं (Pre – fertilization stages)
  2. निषेचन (Fertilization)
  3. निषेचन – पश्च अवस्थाएं (Post – fertilization stages)

निषेचन – पूर्व अवस्थाएं (Pre – fertilization Stage) :-

युग्मकों के संयोजन से पूर्व की सभी अवस्थाएं निषेचन पूर्व अवस्थाएं कहलाती है। इसमें युग्मकों का बनना तथा उनका स्थानांतरण दोनों ही सम्मिलित हैं।

  • युग्मकों के बनने की प्रक्रिया को युग्मक जनन (gametogenesis) कहते हैं। युग्मक जनन की प्रक्रिया में नर तथा मादा दोनों युग्मक बनते हैं, दोनों प्रकार के युग्मक अगुणित (haploid) होते हैं।
  • नर जंतुओं के युग्मकों को शुक्राणु (sperms) कहते हैं जो निषेचन के लिए गतिशील होते हैं जबकि मादा युग्मक को अंडाणु (ovum) कहते हैं जिसका निर्माण मादा जंतु के अंडाशय में होता है, अंडाणु गतिशील नहीं होते हैं।
  • पौधों में नर युग्मक को परागकण (pollen grain) कहते हैं जबकि मादा युग्मक को अंडाणु (ovum) कहते हैं, दोनों युग्मक अगुणित होते हैं। शैवालों में तीन प्रकार के युग्मक बनते हैं –

(a) समयुग्मक (Isogametes) :- ऐसे युग्मक एक समान होते हैं, इनमें नर तथा मादा युग्मको की पहचान नहीं हो पाती है।

(b) असमयुग्मक (anisogametes) :- ऐसे युग्मक असमान होते हैं, इनमें मादा युग्मक नर युग्मक से बड़े होते हैं तथा इनमें फ्लैजिला होते है।

(c) विषमयुग्मक (heterogametes) :- ऐसे युग्मक असमान होते हैं, इनमें मादा युग्मक नर युग्मक से बड़े होते हैं किंतु नर युग्मक में ही फ्लैजिला उपस्थित होते हैं।

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चित्र 1 :- युग्मकों के प्रकार

निषेचन (Fertilization) :-

लैंगिक जनन की वह प्रक्रिया है जिसमें नर तथा मादा युग्मकों का युग्मन (fusion) होता है, वे निषेचन कहलाते हैं। इस प्रक्रिया को युग्मक – संलयन (syngamy) कहा जाता है।

Gametes and Fertilization
चित्र 2 :- युग्मकों के संलयन

युग्मक – संलयन में दो युग्मको के केंद्रक आपस में युग्मन करते हैं, युग्मकों के युग्मन के पश्चात द्विगुणित युग्मनज (zygote) बनता है।

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चित्र 3 :- युग्मकों के संलयन से संतति का निर्मान

जीवों में निषेचन की क्रिया दो प्रकार के होते हैं –

(a) बाह्य निषेचन (External fertilization) :-

निषेचन की क्रिया जब शरीर के बाहर होती है तब उसे बाह्य निषेचन कहते हैं। जैसे – शैवाल, मछली, मेढक, स्टार फिश, जेलीफिश, सीप आदि जलीय जीवों में बाह्य निषेचन होता है।

  • बाह्य निषेचन करने वाले जीवों में नर तथा मादा युग्मक (gamete) एक ही समय में विसर्जित (release) होते हैं। बाहरी निषेचन करने वाले जीवों में निषेचन एक संयोग है, इसलिए निषेचन को सफल बनाने के लिए नर तथा मादा दोनों प्रकार के युग्मक बड़ी संख्या में जीवों द्वारा बनाए जाते हैं।

(b) आंतरिक निषेचन (Internal fertilization) :-

जब निषेचन की क्रिया जीव के शरीर के अंदर होता है तब इस प्रकार के निषेचन को आंतरिक निषेचन कहते हैं। जैसे उच्च श्रेणी के प्राणी – सरीसृप, पक्षी, स्तनधारी तथा उच्च श्रेणी के स्थलीय पौधों में आंतरिक निषेचन होता है। कवक के लैंगिक जनन में भी आंतरिक निषेचन होता है।

  • आंतरिक निषेचन करने वाले सभी जीवों में अंडे मादा के शरीर के अंदर बनते हैं, इनके नर युग्मक चलनशील ( motile) होते हैं। नर युग्मकों को अंडे तक पहुंचने के लिए किसी माध्यम की आवश्यकता पड़ती है। जैसे – ब्रायोफाइट्स तथा टेरिडोफाइट्स श्रेणी के पौधों में नर युग्मकों के स्थानांतरण के लिए जल माध्यम की आवश्यकता पड़ती है।
  • आंतरिक निषेचन करने वाले जीवों में मादा युग्मक की संख्या कम होती है, परंतु शुक्राणु / परागकण की संख्या अधिक होती है। मादा युग्मक अचलनशील होती है।

निषेचन – पश्च अवस्थाएं ( Post – fertilization Stages) :-

निषेचन के पश्चात होने वाले परिवर्तनों को निषेचन पश्च अवस्थाएं कहते हैं। निषेचन के पश्चात युग्मनज (zygote) बनता है, यह युग्मनज विकसित होकर embryo बनाता है। भ्रूण निर्माण प्रक्रिया को embryogenesis कहते हैं। इस प्रक्रिया में कोशिकाओं का विभेदन तथा रूपांतरण होता है।

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चित्र 4 :- पष्पी पादप मे निषेचन पश्च घटनाएं

युग्मनज का विकास जीव तथा उसके जीवन चक्र पर निर्भर करता है। उच्च वर्गीय पादप तथा जंतु में जायगोट बनने के बाद या तो तुरंत विभाजित होना शुरू हो जाता है या कुछ समय बाद उनमें विभाजन शुरू हो जाता है।

  • पुष्पी पादपों में जायगोट अंडाशय के अंदर बनता है। निषेचन के पश्चात पुष्प के बाह्यदल तथा पंखुड़ियां मुरझाकर गिर जाते हैं। अंडाशय विकसित होकर फल बनाता है, अंडाशय आगे चलकर फलभिति का निर्माण करता है। भ्रूण बीज के अंदर होता है।
  • प्राणियों में भ्रूणउद्भव बाहरी होता है या आंतरिक इस आधार पर उन्हें दो वर्गों में विभाजित किया गया है –

(a) अंडप्रजक (Oviparous) :-

इस प्रकार के जीवों द्वारा निषेचित अंडे किसी सुरक्षित स्थान पर दिए जाते हैं। मगरमच्छ, सांप आदि अपने अंडे सुरक्षित स्थान पर देते हैं। इन अंडो के चारों ओर कठोर कैल्शियम युक्त कवच होता है जो उन्हें सुरक्षित बनाए रखने में मदद करता है। एक निश्चित निषेचन अवधि के पश्चात स्फुटक (hatching) द्वारा नए शिशुओं को जन्म देते हैं।

(b) सजीवप्रजक (Viviparous) :-

इस प्रकार के जीवों में मादा के शरीर के अंदर जायगोट विकसित होकर भ्रूण का विकास करता है। इस प्रकार का भ्रूण उद्भव बीजी पौधों तथा स्तनधारी जीवो में होता है। भ्रूण मादा के शरीर में एक निश्चित अवधि तक रहने के पश्चात प्रसव द्वारा पैदा किए जाते हैं।

अंडप्रजक तथा सजीवप्रजक प्राणियों में उत्तरजीविता (survival) की दृष्टि से सजीवप्रजक जीवों में उत्तरजीविता की संभावना अधिक होती है।

अनिषेक जनन (Parthenogenesis) :-

कुछ प्राणियों में बिना निषेचन की क्रिया के संपन्न हुए ही नए जीव का निर्माण हो जाता है, इस प्रकार की घटना को अनिषेक जनन कहा जाता है। जैसे – मधुमक्खी, रोटीफर्स, कुछ पक्षी (टर्की) तथा कुछ छिपकलियाँ। इन जीवों में बिना निषेचन अर्थात नर युग्मक के युग्मन के बिना ही मादा युग्मक नए जीव के निर्माण के लिए विकसित होने लगता है।

कुछ पौधे जैसे – अल्पाइन, गुलाब, संतरा में अनिषेचित अंड विकसित होकर भ्रूण बनाता है।

लैंगिक जनन के लाभ (Advantages of Sexual Reproduction) :-

  1. लैंगिक जनन से उत्पन्न संतति आनुवंशिक दृष्टि से भिन्न होते हैं।
  2. इससे उत्पन्न संतति विभिन्न वातावरण के प्रति अनुकूलित होते हैं।
  3. इससे उत्पन्न संतति में रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती हैं
  4. लैंगिक जनन के फलस्वरुप नई जाति के जीवों का विकास होता है क्योंकि ऐसे जनन से पीढ़ी दर पीढ़ी जीवों में विविधताएं उत्पन्न होती है।

उपर्युक्त विशेषताओं के आधार पर लैंगिक जनन, जनन की सबसे अच्छी विधि मानी जाती है।

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