रोग – प्रतिरोधकता के लिए पादप प्रजनन (plant breeding for disease resistance) :-
उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में उगाई जाने वाली फसलों में जीवाणु, विषाणु तथा कवकों के कारण विभिन्न प्रकार के रोग होते हैं, जिससे फसल पैदावार में कमी हो जाती है। इसे बढ़ान के लिए रोग प्रतिरोधी फसल किस्मों के विकास पादप प्रजनन विधियों द्वारा की जाती है।
इसमें मुख्यतः दो विधियों का प्रयोग किया जाता है –
1. पारंपरिक प्रजनन विधि उत्परिवर्तन प्रजनन (Conventional breeding techniques) :-
इसके द्वारा रोग प्रतिरोधी किस्मों को विकसित करने के लिए संकरण तथा चयन की मुख्य भूमिका होती है।
संकरण तथा चयन द्वारा प्रजनित कुछ रोग – प्रतिरोधी किस्में निम्नांकित है –
फसल किस्म गुण
सरसों – पूसा स्वर्णिम – क्रूसीफर्स का श्वेत किट्ट (white rust of crucifers)
मिर्च – पूसा सदाबहार – चिली मोजैक वायरस, TMV तथा पर्न कुंचन
गेहूं – हिमगिरि – पत्ती का किट्ट रोग
लोबिया – पूसा कोमल – bacterial blight
फूलगोभी – पूसा शुभ्रा – कुंचित अंगमारी
2. उत्परिवर्तन प्रजनन विधि (Mutation breeding) :-
जीन के अंदर उनके अनुक्रमों में परिवर्तन को जीन उत्परिवर्तन करते हैं। फसली पौधों में उत्परिवर्तन कृत्रिम रूप से उत्पन्न किया जाता है। इसके लिए mutagens जैसे – एथाइलमीथेन सल्फोनेट (EMS), सोडियम एजाइड, x- ray गामा किरणें आदि का प्रयोग किया जाता है।
उत्परिवर्तन प्रजनन द्वारा फसलों की निम्नांकित किस्में विकसित की गई है –
गेहूं – किट्ट रोग के प्रति रोग – प्रतिरोधी क्षमता
जौ – पाउडरी मिल्डयू के प्रति रोग – प्रतिरोधी क्षमता
मूंग – पित्त मोजैक वायरस तथा चुर्निल आसिता के प्रति रोग – प्रतिरोधक क्षमता।