पादप प्रजनन क्या है? पादप प्रजनन के उद्देश्य, उनके मुख्य चरण तथा भारत में हरित क्रांति!

09/04/2022 Vinod 0 Comments

पादप प्रजनन (Plant breeding) :-

पादप प्रजनन में फसलों की ऐसी नई तथा उन्नत गुणवत्ता वाली किस्मों को विकसित किया जाता है जिनमें वर्तमान अथवा प्राचीन किस्मों से अच्छे गुण विद्यमान हो। यह तभी संभव है जब वर्तमान किस्मों में आनुवंशिक बदलाव (hereditary change) लाया जाए। यह बदलाव पादप प्रजनन की विधियों के प्रयोग द्वारा लाया जा सकता है।

  • पादप प्रजनन में शुद्धवंशक्रम(pure lines) का संकरण (crossing) सम्मिलित है। इस संकरण के बाद कृत्रिम चयन कर अधिक उत्पादन देने वाली, रोग प्रतिरोधी, पोषणज किस्मों को अलग कर लिया जाता है।
  • संकरण द्वारा दो जेनेटिकली अलग जनकों के बीच क्रॉस कराकर नई किस्में विकसित की जाती है।
  • पादप प्रजनन में आनुवंशिकी (genetics), आण्विक विज्ञान (molecular biology) तथा उत्तक संवर्धन (tissue culture) विधियों का नियमित प्रयोग करके साथ-साथ आनुवंशिकी अभियांत्रिकी (genetic engineering) का प्रयोग भी वर्तमान समय में किया जा रहा है।
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चित्र 1 :- पादप प्रजनन ।

पादप प्रजनन का उद्देश्य (objectives of plant breeding) :-

1. उन्नत गुणवत्ता तथा उच्च उपजी फसल उत्पादन।

2. रोग जनको (विषाणु, कवक तथा जीवाणु) के प्रति प्रतिरोधक किस्मों का विकास।

3. अत्याधिक ताप, सुखा तथा लवणता के प्रति सहनशीलता।

4. पीडकों (pests) के प्रति प्रतिरोधक किस्मों का विकास।

5. किसी विशेष जलवायु क्षेत्र के लिए नई किस्मों का विकास।

6. पौधों के खाने योग्य भाग को टॉक्सिन से मुक्त करना।

पादप प्रजनन के मुख्य चरण (main steps of plant breeding) :-

पादप प्रजनन के मुख्य चरण निम्नवत है –

1. जननद्रव्य संग्रहण (germplasm collection) :-

किसी फसल में पाए जाने वाले सभी जीनों के विविध अलील (allele) का समस्त संग्रहण को उनका जननद्रव्य संग्रहण कहा जाता है।

पादपों में उपस्थित प्राकृतिक जीन की पूर्ण जानकारी प्राप्त करना पादप प्रजनन के लिए अपेक्षित होता है।

2. जननद्रव्यों का मूल्यांकन तथा उनका चयन (evaluation of germplas and it’s selection) :-

जननद्रव्य संग्रहण के बाद उनका मूल्यांकन इसलिए किया जाता है ताकि उनमें निहित लक्षणों का पता लगाया जा सके तथा विशेष लक्षणयुक्त पौधे की पहचान की जा सके। चयनित पौधों को बहुगुणित करके उनका प्रयोग संकरण की प्रक्रिया में किया जाता है। इस विधि द्वारा जहां तक संभव हो पाता है वहां तक वांछित शुद्धवंशक्रम प्राप्त किया जाता है।

3. चयनित जनकों के मध्य पर-संकरण (cross-hybridization among the selected parents) :-

वांछित गुणों को प्राप्त करने के लिए दो चयनित जनको के मध्य पर-संकरण कराना पड़ता है। इसमें एक जनक मादा तथा दूसरा जनक नर के रूप में चयनित किया जाता है। नर के पराग को एकत्रित कर मादा के वर्तिकाग्र पर छिड़काव किया जाता है। इस विधि द्वारा आनुवंशिक वांछित लक्षणों का संगम कर संकर पौधा तैयार किया जाता है, जिसमें दोनों जनको के गुण उपस्थित होते हैं।

4. श्रेष्ठ पुनर्योगज का चयन तथा परीक्षण (selection and testing of superior recombinants) :-

पादप प्रजनन के इस चरण में संतति (progeny) का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है ताकि उन संततियों का पता लगाया जा सके जिनमें वांछित गुण मौजूद है। प्रजनन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक है कि संतातियों का वैज्ञानिक मूल्यांकन कर श्रेष्ठ गुणों वाले संतति का पता लगाया जाय। यह संतति कई पीढ़ियों तक स्वपरागण करते हैं और एक अवस्था ऐसी आती है जब इनमें समरूपता की स्थिति आ जाती है।

5. नव-चयनित वंशक्रम का परीक्षण (testing of new cultivars) :-

नव-चयनित वंशक्रम का परीक्षण उनमे निहित गुणों, जैसे- उत्पादन गुणवत्ता, रोग प्रतिरोधी क्षमता आदि के लिए मूल्यांकन किया जाता है। मूल्यांकित पौधों को सर्वप्रथम अनुसंधानवाले खेतों में उगाया जाता है जहां आदर्श उर्वरक, उपायुक्त सिंचाई की सुविधा तथा अन्य फसल प्रबंधन संबंधी सुविधाएं मौजूद रहती है। अनुसंधानवाले खेतों में परीक्षण के बाद पौधों को निर्मुक्त किया जाता है।

6. नव-चयनित वंशक्रम को निर्मुक्त करना तथा उनका व्यापारीकरण (release and commercialisation of new cultivars) :-

मूल्यांकन के बाद नव-वंशक्रम को देश भर में वितरित किया जाता है। निर्मुक्त होने के बाद खेतों में इनका परीक्षण कम से कम तीन ऋतुओं तक किया जाता है। इन निर्मुक्त वंशक्रम को देश के विभिन्न जलवायु वाले क्षेत्रों में भेजा जाता है जहां उन फसलों की खेती की जाती है।

भारत में हरित क्रांति (Green revolution in India) :-

भारतवर्ष के स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती बढ़ती हुई जनसंख्या के पोषण की थी, परंतु कृषि योग्य भूमि सीमित थी। 1960 के मध्य से पादप प्रजनन की विधियों का उपयोग कर गेहूं, धान, मक्का आदि की उन्नत संकर किस्में विकसित की गई। जिनका परिणाम यह हुआ कि देश में खाद्य उत्पादन में कई गुना वृद्धि हुई। इस प्रावस्था को हरित क्रांति के नाम से जाना जाता है।

  • भारत में हरित क्रांति का जनक एम एस स्वामीनाथन को कहां जाता है।
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चित्र 2 :- भारत में हरित क्रांति।

उन्नत किस्मों का विकास (Development of superior varieties) :-

1. गेहूं (wheat) :-

भारत में गेहूं की उन्नत किस्मों को विकसित करने का श्रेय भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (Indian Agricultural Research Institute) के वैज्ञानिकों को जाता है। विगत 5 दशकों मेंं गेहूंं का उत्पादन 11 मिलियन टन से बढ़कर 75 मिलियन टन हुआ है। इस सफलता में वैज्ञानिकों द्वारा विकसित गेहूंं की अर्ध-बौनी किस्मों का महत्वपूर्ण योगदान है।

मेक्सिको स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर व्हीट एंड मेज इंप्रूवमेंट के वैज्ञानिक Dr N E Borloug गेहूं की बौनी किस्मों का विकास । डॉक्टर बारलॉग ने 1963 में आई आर आई के वैज्ञानिकों को गेहूं की बौनी तथा अर्ध बौनी किस्मों के बीज उपलब्ध कराएं। इन किस्मों से भारतीय वैज्ञानिकों ने भारतवर्ष की देसी किस्मों के साथ संकरण कराया। परिणामस्वरूप ऐसी किस्म विकसित हुई जो उच्च उत्पादन क्षमतावाली, रोग प्रतिरोधी, उर्वरकों के प्रति संवेदी तथा खेत में नहीं झुकने वाली थी।

गेहूं की कुछ उन्नत किस्में एवं उनके गुण :-

(a) शरबती सोनोरा – जल्दी पकने वाली।

(b) लेरमा रोजो – बौनी किस्म, गेरुआ रोग प्रतिरोधी।

(c) सोनोरा 64 – दोगुनी बौनी, देर से बुआई के लिए उपयुक्त।

(d) कल्याण सोना – अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए उपायुक्त।

(e) मोती एच डी 1949 – तिगुनी बौनी किस्म, रोटी बनाने के लिए अधिक उपयुक्त।

2. धान (paddy) :-

विगत 5 दशकों में धान का उत्पादन 35 मिलियन टन से बढ़कर 90 मिलियन टन तक पहुंच गया है। धान संबंधी शोध कार्य तथा नई किस्में विकसित करने का मुख्य केंद्र कटक (उड़ीसा) स्थित केंद्रीय धान अनुसंधान संस्थान है।

धान की उन्नत किस्में एवं उनके गुण :-

(a) साबरमती – यह 118 दिनों में तैयार होने वाली किस्म है। यह बासमती की उत्तम किस्म है।

(b) जया – यह 130 दिनों में तैयार होने वाली किस्म है।

(c) बाला – यह बौनी किस्म है। इसकी खेती मुख्यतः उच्च भूमि में की जाती है।

(d) कृष्णा – इस किस्म के चावल में लाइसिन एमिनो एसिड ज्यादा होता है। यह भी बौनी किस्म है।

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चित्र 3 :- धान की उन्नत किस्म।
3. मक्का (maize) :-

मक्का या कॉर्न विश्व की एक महत्वपूर्ण फसल है। भारतवर्ष में मक्का की नई उन्नत किस्में विकसित की गई है जिनमें सोना, जवाहर, गंगा-5, गंगा-3, हाई स्टार्च, अंबर, शक्ति, रतन, विजय, विक्रम, किसान, MH-129 आदि विकसित की गई है।

4. गन्ना Sugar cane) :-

यह उष्णकटिबंधी एशिया की प्रमुख फसल है। भारतवर्ष में 3 मिलियन हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में इसकी खेती की जाती है। गन्ना प्रजनन संस्थान कोयंबटूर द्वारा गन्ने की कई उन्नत किस्में विकसित की गई हैै इनमें प्रमुख है – COC671, HM658,CO668, CO8152, CO997 आदि।

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