पशुपालन, फार्म पशुओं का प्रबंधन, डेयरीफार्म, कुक्कुटफार्म तथा मत्स्यकी या मछली पालन क्या है?

28/03/2022 Vinod 0 Comments

पशुपालन (Animal husbandry) :-

पशुपालन विज्ञान की वह शाखा है जिसके अंतर्गत पालतू पशुओं के भोजन, आवास, स्वास्थ्य, प्रजनन आदि पक्षों का अध्ययन किया जाता है। पशुपालन के अंतर्गत भैंस, गाय, भेड़, बकरी, ऊंट आदि का प्रजनन करते हैं तथा इन पशुओं की देखभाल करते हैं।

  • पशुपालन पशुधन वृद्धि की एक कृषि-पद्धति है जिसमे डेयरीफार्म, कुक्कुटफार्म तथा मत्स्यकी को भी सम्मिलित किया जाता है। पालतू पशुओं से हमें दूध, मांस, अंडा, ऊन आदि की प्राप्ति होती है।
  • जनसंख्या की दृष्टि से 70% से अधिक पशुधन भारत तथा चीन में है परंतु विश्वस्तर पर फार्म उत्पादों की तुलना में ये देश केवल 25% ही योगदान करते हैं। उत्पादकता बढ़ाने के लिए पारंपरिक पद्धतियों के अतिरिक्त नई प्रौद्योगिकी को भी अपनाने की भी आवश्यकता है।
  • पशुपालन विज्ञान के अध्ययन से उत्पन्न नस्ल की गाय, भैंस आदि प्रजनन द्वारा प्राप्त किए जा सकते हैं।
  • हमारे देश में मत्स्य पालन की असीम संभावनाएं हैं। पशुपालन विज्ञान द्वारा मछलियों के बच्चों का सफल निष्कासन, मछलियों के आकार में समुचित वृध्दि, उनका उचित रख-रखाव, रोगों से बचाव आदि संबंधित बातें सीखी जा सकती है।
  • जनसंख्या के अनुरूप भोजन की बढ़ती आवश्यकता की पूर्ति के लिए अधिक पुष्ट, मांसल तथा जल्दी बढ़नेवाली नस्ल की मुर्गीयां प्रजनन के द्वारा प्राप्त की जा सकती है। भारतवर्ष में भोजन के रूप में अंडे की प्रति व्यक्ति वार्षिक खपत मात्र 6 है जबकि अमेरिका में यह 295 है।

फार्म पशुओं का प्रबंधन (Management of farm animals) :-

खाद्य-उत्पादन में वृद्धि के लिए फार्म पशुओं का प्रबंधन आवश्यक है। दूध देने वाले पशुओं, कुक्कुटपालन, पशुप्रजनन, मधुमक्खीपालन, मत्स्यपालन के पारंपरिक प्रबंधन को बढ़ावा तभी मिल सकता है जब नस्ल की गुणवत्ता को ध्यान में रखकर उनके प्रजनन तथा रख-रखाव पर विशेष ध्यान दिया जाए।

डेयरीफार्म (Dairy farm) :-

पशुपालन के अन्तर्गत डेयरी उद्योग में दुधारू पशुओं जैसे – गाय, भैंस आदि का प्रबंधन किया जाता है। दुग्ध उत्पादन मुख्यतः इस बात पर निर्भर करता है कि उस डेयरी में रखे गए पशुओं की नस्ल की गुणवत्ता क्या है? भारतवर्ष में गायों और भैंसों की लगभग 32 प्रजातियां विद्यमान है।

  • भारतीय गाय का वैज्ञानिक नाम बॉस इंडिकस (Bos indicus) है। प्रमुख भारतीय गाय साहीवाल, गिर, रेड सिंधी, थरपाकर तथा हरियाणवी है। गाय की देसी प्रजातियां पर्याप्त दूध नहीं देती है इसलिए हमारे देश में भी विदेशी नस्लों से संकरण (hybridization) के द्वारा अधिक दुधारू गायों की प्रजातियां विकसित की गई है। जैसे – जर्सी, करनस्विस, होल्स्टाइनफ्रीसिऑन, करनफ्राइस तथा फ्रिसिऑनसाहीवाल

हमारे देश में उन्नत नस्ल की अधिक दूध देने वाली गायों की संकर नस्लें राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (National Dairy Research Institute), करनाल, हरियाणा में विकसित की गई है।

  • भारतीय भैंस का वैज्ञानिक नाम बुबैलस बुबैलिस (Bubalus bubalis) है। भारतवर्ष मेंं भैंसों की 10 प्रजातियां पाई जाती है जिनमें, मुर्राह, नागपुरी, मेहसाना, सुरती तथा जाफराबादी प्रमुख है।

भैंस की अधिक उत्पादन क्षमतावाली नस्लें मुर्राह है जो अपने दुग्ध स्रावकाल में लगभग 2000 लीटर दूध देती है।

डेयरीफार्म प्रबंधन में निम्नलिखित संसाधनों की आवश्यकता होती है –

  1. नस्ल :- अधिक उत्पादन के लिए पशुओं की अच्छी नस्लों केेेेेेे चयन तथा उनकी रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता महत्वपूर्ण हैं। नस्ल के चुनाव में क्षेत्र की जलवायु, परिस्थितियों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
  2. देखभाल :- अच्छे उत्पादन के लिए पशुओं की अच्छी देखभाल आवश्यक है। पशुओं को रहने के लिए स्वच्छ आवास, पर्याप्त जल सुविधा तथा रोगमुक्त वातावरण रहना आवश्यक है। पशुओं का आवास गृह स्वच्छ, सूखा तथा हवादार होना चाहिए।

3. भोजन :- दुग्ध की उत्पादकता का सीधा संबंध पशुओं को दिए जानेवाले संतुलित आहार की गुणवत्ता तथा मात्रा से होता है। पशुधन का आहार ऐसा होना चाहिए जिसमे कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, खनिज तथा विटामिन संतुलित मात्रा में विद्यमान हो। इसकेेे अतिरिक्त्त आहार में जल और रूक्षांश की आवश्यक मात्रा का होना अनिवार्य है।

4. दुग्ध उत्पादों का भंडारण तथा परिवहन :- दूध को निकालनेेेेेे, उसके भंडारण तथा डेयरीफार्म से अन्यत्र ले जाने में विशेष सावधानी रखनी पड़ती है। दूध देने वालेेे पशुओं तथा दूध निकालनेवाले व्यक्तियों की सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए अन्यथा सूक्ष्मजीव दूूध को दुहने, भंडारण तथा परिवहन में खराब कर देंगे। दुग्ध या दुग्ध उत्पाद खराब ना होने पाए उसके लिए शीत वातावरण की व्यवस्था करनी होगी।

5. पशु चिकित्सा :- पशुओं को रोगों से बचाने के लिए नियमित जांच पशु चिकित्सक द्वारा करना आवश्यक है। संक्रामक रोगों से बचाव के लिए

पशुधनों को समय समय पर टिके लगाना अत्यंत आवश्यक है।

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चित्र 1 :- पशुपालन (डेयरी फार्म)।

कुक्कुटफार्म :-

मांस तथा अंडे की प्राप्ति के लिए कुक्कुटपालन किया जाता है। कुक्कुटपालन के अंतर्गत मुर्गी के अतिरिक्त बत्तख, टर्की तथा गीज (Geese) को भी सम्मिलित किया जाता है। प्रचलित भाषा में कुक्कुटपालन को मुर्गी पालन भी कहा जाता है जो पशुपालन का महत्वपूर्ण भाग है।

अंडे देने वाली मुर्गीयां एग लेअर्स जबकि अधिक

मांस प्राप्त करने के उद्देश्य से पाली जानेवाली मुर्गियां बॉयलर कहलाती है।

मुर्गियों की देसी किसमें है – असील, बसरा, ब्रह्मा, कोचीन, चिरगांव, घागुस। देशी मुर्गियों की उत्पादकता कम होती है। औसतन एक देसी मुर्गी 1 वर्ष में लगभग 60 अंडे देती है।

विदेशी नस्लों के प्रमुख मुर्गियां है- व्हाइट लेगहॉर्न, रॉक ऑस्ट्रालॉप, ससेक्स, ब्लैक माइनॉर्क, रोड आइलैंड रेड आदि।

देशी नस्ल की मूर्तियों का प्रजनन उच्च नस्ल की विदेशी प्रजातियों से कराकर वांछित गुणोंवाली मुर्गीयां प्राप्त की गई है। ऐसी मुर्गियों से अधिक मांस उत्पाद मिलता है तथा इस नस्ल की मुर्गीयां ज्यादा अंडे भी देती है। ऐसी संकर मुर्गियों की रोग निरोधक क्षमता भी अधिक होती है। देश में विकसित की गई संकर नस्ल की मुर्गीयों में ILS-82, HH-260, B-77 आदि प्रमुख हैं।

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चित्र 2 :- पशुपालन ( मुर्गी पालन)।

कुक्कुटफॉर्म प्रबंधन में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना आवश्यक है।

  1. बेहतर नस्ल :- संकर नस्ल वाली मुर्गियां शीघ्र परिपक्व हो जाती है तथा इनकी मृत्यु दर भी कम होती है। संकर किस्मों में ILS-82 तथा B-77 प्रति वर्ष क्रमशः लगभग 200 तथा 260 अंडे देती है। राष्ट्रीय कुक्कुट प्रजनन फार्म जो भुवनेश्ववर, मुंबई, चंडीगढ़ तथा हिसारघट्टा में अवस्थित है, उन्नत प्रजाति केे मुर्गियों के लिए परियोजनााएं चलाई जा रही है।
  2. सुरक्षित परिस्थितियां :- कुक्कुट आवास इस प्रकार होना चाहिए जिसमें कुक्कुट प्रतिकूल परिस्थितियों जैसेे – वर्षा, कड़ी धूप, अत्यधिक ठंड तथा परभक्षी से सुरक्षित रह सके।
  3. कुक्कुटों का आहार :- इनके संतुलित आहार में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसाा, खनिज, विटामिन तथा शुद्ध जल का होना आवश्यक है। कैल्शियम तथा फास्फोरस की समुचित मात्रा अंडा देनेेवाली मुर्गियोंं को आवश्यक होता है।
  4. कुक्कूटों के रोग :- मुर्गियों को होने वाली बीमारियों मेंं रानीखेत, हैजा, वर्ड फ्लू आदि प्रमुख हैं। ये प्रायः बैक्टीरिया, वायरस के संक्रमण से होता है। संक्रमण का नियंत्रण तथा उपचार समय रहते न होने से रोग महामारी की तरह फैल जाता है। रोगों से बचाव के लिए समय-समय पर टीके लगवाना आवश्यक है।

मत्स्यकी या मछली पालन (Fisheries) :-

मत्स्यकी एक प्रकार का उद्योग है जो पशुपालन के अंर्तगत आता है, इसका सीधा संबंध मत्स्य पालन, उनका प्रजनन तथा उनकी बिक्री से है। इस उद्योग में अन्य जलीय जीवों को भी सम्मिलित किया गया है।

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चित्र 3 :- पशुपालन (मत्स्य पालन)।
  • विभिन्न संसाधनों का उपयोग कर जलीय पौधे तथा जंतु जैसे- मछलियां, झींगा, लॉब्सटर, केकरा, सीप इत्यादि का उत्पादन जलीय संवर्धन (aquaculture) कहलाता है तथा केवल मछलियों का उत्पादन एवं प्रबंधन पिसीकल्चर या मत्स्य पालन या फिश फार्मिंग कहलाता है।
  • मछलियां प्रोटीन के मुख्य स्रोत होता है। मछलियों के यकृत से प्राप्त तेल, शाक या कॉड लिवर ऑयल का औषधिक महत्व है।
  • कुल मछली उत्पादन में भारत का विश्व में सातवां स्थान है हमारे देश को मछली उत्पादों के निर्यात से लगभग 4000 करोड़ रुपए की वार्षिक आय होती है।
  • मछलियां अलवणीय जल या मृदु जल तथा लवणीय जल या कठोर जल दोनों प्रकार के जल में पाई जाती है। अलवणीय या मीठे जल में पाई जाने वाली मछलियों में रोहू, कतला, सिंगी, टेंगरा, मांगुर, गरई आदि प्रमुख है।
  • हमारे देश में लगभग 75000 किलोमीटर का समुद्रीतट समुद्री मछली संसाधन क्षेत्र है। कृषि में हरित क्रांति की सफलता के बाद नीली क्रांति मत्स्य उद्योग को बढ़ावा देकर किया जा रहा हैै।
  • मृदुजलीय मछली उत्पादन में वृद्धि के लिए मिश्रित मछली संवर्धन (composite fish farming) की विधि अपनाई जाती है। मिश्रित मछली संवर्धन विधि में कई प्रजातियों की मछलियों का संवर्धन एक तालाब में एक ही समय किया जाता है।
  • मत्स्य संवर्धन तकनीक द्वारा उन्नत किस्म की मछलियों का उत्पादन किया जाता है। नर तथा मादा मछलियों से क्रमशः शुक्राणु तथा अंडाणु प्राप्त कर उन्हें मिश्रित कराया जाता है। निषेचित अंडों को संवर्धन तालाब में रखा जाता है। अंडों से उत्पन्न बच्चे कुछ समय में बढ़कर अंगुलिकाएं बन जाती है।
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चित्र 4 :- पशुपालन में मछली पालन की आधुनिक तकनीक।

नोट :- विश्व की जनसंख्या में निरंतर वृद्धि के कारण खाद्य उत्पादन मनुष्य की पहली प्राथमिकता बन गया है।खाद्य उत्पादन की वृद्धि में पशुपालन तथा पादप प्रजनन पर लागू होने वाले जैविक सिद्धांत हमारे प्रयासों को सफल बनाने में मुख्य भूमिका निभाते हैं। पशुपालन में भ्रूण स्थानांतरण की नई तकनीक से पशु नस्लों को सुधारने तथा अधिक उपयोगी बनाने में सफलता मिली है।

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