गोलीय दर्पण किसे कहते हैं?अवतल दर्पण, उत्तल दर्पण तथा चिन्ह परिपाटी का वर्णन!

14/06/2022 Vinod 0 Comments

गोलीय दर्पण (Spherical mirrors) :-

गोलीय दर्पण किसी खोखले गोले का एक भाग होता है, जिसकी एक सतह (भीतरी या बाहरी) पॉलिशदार रहती है, ताकि पृष्ठ से प्रकाश का नियमित परावर्तन हो सके।

गोलीय दर्पण संबंधी कुछ परिभाषाएं –

(a) वक्रता केंद्र (Centre of curvature) :-

गोलीय दर्पण जिस गोले का भाग होता है उस गोले के केंद्र को गोलीय दर्पण का वक्रता केंद्र कहते हैं।

(b) ध्रुव (Pole) :-

गोलीय दर्पण की परावर्तक सतह के मध्यबिंदु को दर्पण का ध्रुव कहा जाता है।

(c) वक्रता त्रिज्या (Radius of curvature) :-

गोलीय दर्पण के ध्रुव एवं वक्रता केंद्र के बीच की दूरी को दर्पण की वक्रता त्रिज्या कहा जाता है। यह उस गोले की त्रिज्या है जिसका गोलीय दर्पण एक भाग है।

(d) प्रधान अक्ष (Principal axis) :-

ध्रुव एवं वक्रता केंद्र से गुजरने वाली काल्पनिक सरल रेखा को गोलीय दर्पण का प्रधान अक्ष कहा जाता है।

(e) फोकस (Focus) :-

गोलीय दर्पण की परावर्तक सतह पर प्रधान अक्ष के समांतर आपतित किरणें परावर्तन के बाद प्रधान अक्ष के जिस बिंदु पर अभिसृत (converge) होती है (अवतल दर्पण के लिए) या जिस बिंदु से अपसृत (diverge) होती हुई प्रतीत होती है (उतल दर्पण के लिए), उस बिंदु को गोलीय दर्पण का फोकस कहा जाता है।

(f) फोकस दूरी (Focal length) :-

ध्रुव एवं फोकस के बीच की दूरी को गोलीय दर्पण की फोकस दूरी या फोकसांतर कहा जाता है।

(g) फोकस तल (Focal plane) :-

गोलीय दर्पण के प्रधान अक्ष के लंबवत तथा फोकस से गुजरनेवाले काल्पनिक समतल को गोलीय दर्पण का फोकस तल कहा जाता है।

(h) द्वारक (Aperture) :-

गोलीय दर्पण के परावर्तक पृष्ठ के कोर (edge) से बनने वाले वृत्त के व्यास को गोलीय दर्पण का द्वाराक कहा जाता है।

(i) प्रधान या मुख्य काट (Principal section) :-

किसी गोलीय दर्पण के प्रधान अक्ष से गुजरने वाले तल द्वारा दर्पण की जो काट प्राप्त होती है, उसे उस दर्पण का प्रधान या मुख्य अक्ष कहा जाता है। चित्रों में दर्पण को उसकी प्रधान काट द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

गोलीय दर्पण के प्रकार (types of spherical mirrors) :-

गोलीय दर्पण निम्नांकित दो प्रकार के होते हैं –

(1) अवतल दर्पण (Concave mirror)

(2) उत्तल दर्पण (convex mirror)

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चित्र 1 :- अवतल दर्पण तथा उत्तल दर्पण।

अवतल दर्पण (concave mirror) :-

अवतल दर्पण में उभरी सतह पर पॉलिश या कलई चढ़ा दी जाती है, ताकि अंदरवाली सतह से प्रकाश का नियमित परावर्तन हो सके। इस दर्पण का वक्रता केंद्र C परावर्तक सतह के सामने होता हैै।

अवतल दर्पण के कारण बने प्रतिबिंब की स्थिति एवं प्रकृति :-
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चित्र 2 :- अवतल दर्पण के विभिन्न स्थानों पर प्रतिबिंब की स्थिति तथा प्रकृति ।
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चित्र 3 :- अवतल दर्पण द्वारा बने प्रतिबिंब की किरण आरेख।

उत्तल दर्पण (Convex mirror) :-

उत्तल दर्पण के भीतर वाली सतह पर पॉलिश या कलई चढ़ा दी जाती है, ताकि उभरी सतह से प्रकाश का नियमित परावर्तन हो सके। इस दर्पण का वक्रता केंद्र C परावर्तक सतह के पीछे होता है।

नोट :- अवतल तथा उत्तल दोनों दर्पण के प्रवर्तक सतहों के प्रत्येक भाग से प्रकाश का परावर्तन, परावर्तन के नियमानुसार ही होती है।

उत्तल दर्पण के कारण बने प्रतिबिंब की स्थिति एवं प्रकृति :-
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चित्र 4 :- उतल दर्पण के विभिन्न स्थानों पर प्रतिबिंब की स्थिति तथा प्रकृति ।
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चित्र 5 :- उत्तल दर्पण द्वारा बने प्रतिबिंब की किरण आरेख़।

चिन्ह परिपाटी (Sign Convention) :-

वस्तुओं और प्रतिबिंबों की विभिन्न स्थितियों के बीच अंतर स्पष्ट किया जा सके, इसी दृष्टिकोण से दूरियों के चिन्हों की एक उपयुक्त परिपाटी प्रचलित है, जिसे चिन्ह परिपाटी कहा जाता है।

किसी दर्पण अथवा लेंस के सामने रखी गई वस्तु के प्रतिबिंब का स्थान और प्रकृति वस्तु की स्थिति पर निर्भर करता है। प्रतिबिंब कभी वास्तविक बनता है तो कभी आभासी। इसी प्रकार प्रतिबिंब का स्थान दर्पण अथवा लेंस के कभी सामने होता है, तो कभी इनके पीछे।

किसी वस्तु के प्रतिबिंब के स्थान निर्धारण के लिए दूरियों की एक चिन्ह परिपाटी की आवश्यकता होती है, ताकि वस्तु और प्रतिबिंब की विभिन्न स्थितियों के बीच अंतर स्पष्ट किया जा सके।

चिन्ह परिपाटी के अनुसार,

  1. प्रकाशिक व्यवस्था जैसे दर्पण, लेंस अथवा इनकी मिलती-जुलती व्यवस्था के प्रधान अक्ष को निर्देशांक ज्यामितिय XX’ माना जाता है।
  2. सभी दूरियां दर्पण अथवा गोलीय अपवर्तक सतहों के ध्रुव या लेंस के प्रकाश केंद्र से मापी जाती है, अर्थात ध्रुव अथवा प्रकाश केंद्र को मूलबिंदु माना जाता है।
  3. आपतित प्रकाश की दिशा में मापी गई सभी दूरियां धनात्मक होती है तथा आपतित प्रकाश की दिशा के विपरीत मापी गई सभी दूरियां ऋणात्मक होती है।
  4. प्रकाशिक व्यवस्था के अक्ष, अर्थात XX’ अक्ष के लंबवत मापी गई दूरीयां धनात्मक तब होती है जब वे उसके ऊपर होती है, तथा ऋणात्मक तब होती है जब उसके नीचे होती है।
की चिन्ह परिपाटी
चित्र 6 :- दर्पण की चिन्ह परिपाटी।

चिन्ह परिपाटी के अनुसार,

(a) अवतल दर्पण की वक्रता त्रिज्या (R) तथा फोकस दूरी (f) ऋणात्मक होती है।

(b) उत्तल दर्पण की वक्रता त्रिज्या (R) तथा फोकस दूरी (f) धनात्मक होती है।

(c) अवतल लेंस की फोकस दूरी (f) ऋणात्मक होती है।

(d) उत्तल लेंस की फोकस दूरी (f) धनात्मक होती हैै।

(e) लेंस की क्षमता (power) के चिन्ह वे ही होते हैं, जो उनके फोकस दूरियों के होते हैं।

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