गुणसूत्रीय विकार : टर्नर्स सिंड्रोम, डाउन्स सिंड्रोम तथा क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम

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03/05/2022 Vinod 0 Comments

गुणसूत्रीय विकार (Chromosomal disorders) :-

मानव शरीर में पाए जाने वाले 23 जोड़े गुणसूत्र की संख्या या संरचना में किसी प्रकार के परिवर्तन से गुणसूत्रीय विकार उत्पन्न होता है। कोशिका विभाजन के समय क्रोमेटिड के विसंयोजन में होने वाली गड़बड़ी से संतति कोशिका में एक गुणसूत्र की कमी या वृद्धि हो जाती है। इसके फलस्वरूप मनुष्य में गुणसूत्रीय विकार उत्पन्न हो जाते हैं। इसका मुख्य उदाहरण टर्नर्स सिंड्रोम, डाउन्स सिंड्रोम, klinfelter’s syndrome आदि है।

टर्नर्स सिंड्रोम :-

जब मनुष्य के द्विगुणित गुणसूत्रों की संख्या में से एक की कमी हो जाती है तो यह सिंड्रोम उत्पन्न होता है। इस प्रकार यह मोनोसोमी (2n-1) का उदाहरण है। इससे मानव शरीर में गुणसूत्रों की संख्या 45 रह जाती है।

यह लक्षण नारियों में पाया जाता है, इस लक्षण में नारियों के अंडाशय अपरिपक्व होते हैं तथा इनमें द्वितीयक लैंगिक लक्षणों (secondary sexual characters) का अभाव रहता है। ऐसे स्त्रियों में बच्चे पैदा करने की क्षमता नहीं रहती है।

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चित्र 1 :-

डाउन्स सिंड्रोम (Down’s syndrome) :-

जब मनुष्य के 21वें जोड़े गुणसूत्र में एक गुणसूत्र की वृद्धि हो जाती है तो डाउन सिंड्रोम नामक रोग उत्पन्न हो जाती है। ऐसे गुणसूत्रीय विकार बच्चों में उत्पन्न होती है। इस प्रकार यह ट्राइसोमी (2n+1) का उदाहरण है।

इस प्रकार के रोगी की प्रत्येक कोशिका में 47 गुणसूत्र पाए जाते हैं।

लैंगडन डाउन ने 1866 में इस विकार की खोज की थी, इसलिए इसे डाउन्स सिंड्रोम कहते हैं।

इस रोग से ग्रसित बच्चे देखने में मंगोलियन के सामान लगते हैं, इसलिए इसे मंगोलियन संलक्षण भी कहते हैं।

ऐसे रोगी छोटे कद के होते हैं, इसके सिर गोल, जीभ मोटा एवं मुंह आंशिक तौर पर खुला रहता है। ऐसे रोगी मंदबुद्धि के होते है तथा श्वास संबंधी संक्रमण इनमें आसानी से हो जाता है। इनकी हथेली असामान्य एवं उनके ह्रदय में दोष रहता है।

सामान्यतः ऐसे बच्चे 8 से 12 वर्ष की उम्र तक ही जीवित रहते हैं।

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चित्र 2 :-

क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम (Klinfelter’s syndrome) :-

यह भी ट्राइसोमी का एक उदाहरण है लेकिन इसमें लिंग गुणसूत्र X की एक अतिरिक्त प्रतिलिपि के मौजूद रहने के चलते हैं मानव के प्रत्येक कोशिका में 47 गुणसूत्र (44+XXY) हो जाता है। यह लक्षण पुरुषों में पाया जाता है जो देखने में सामान्य लगते हैं, लेकिन इनमें मादा लक्षण परिलक्षित होते हैं जैसे स्त्री की भांति वक्ष की वृद्धि। ऐसे पुरुष प्रायः बांझ होते हैं, क्योंकि इनमें शुक्राणु बहुत कम बन पाते हैं।

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चित्र 3 :-

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